मध्य प्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण रद्द होने के बाद सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी, मुख्यमंत्री ने विधि विशेषज्ञों से किया मंथन
मध्य प्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण रद्द होने के बाद सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी, मुख्यमंत्री ने विधि विशेषज्ञों से किया मंथन
मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान को हाई कोर्ट द्वारा असंवैधानिक ठहराए जाने के बाद राज्य सरकार ने फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की प्रक्रिया तेज कर दी है। इस सिलसिले में 13 अक्टूबर 2026 को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने नई दिल्ली में भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और राज्य के महाधिवक्ता प्रशांत सिंह के साथ बैठक की, जिसमें फैसले के कानूनी पहलुओं और शीर्ष अदालत में दायर की जाने वाली विशेष अनुमति याचिका (SLP) की रणनीति पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया।
इससे पहले 9 अक्टूबर 2026 को जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की खंडपीठ ने 90 से अधिक याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए 2019 के उस संशोधन कानून को रद्द कर दिया था, जिसके तहत ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया गया था। अदालत ने 159 पृष्ठों के अपने आदेश में स्पष्ट किया कि आरक्षण की कुल सीमा 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ाने के लिए राज्य सरकार कोई असाधारण परिस्थिति या पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी, इसलिए सरकारी भर्तियों और उच्च शिक्षा में ओबीसी आरक्षण पूर्ववत 14 प्रतिशत ही लागू रहेगा। इसके अलावा अदालत ने विवादित 87:13 भर्ती फॉर्मूले के तहत होल्ड पर रखे गए 13 प्रतिशत पदों को आगामी तीन महीनों के भीतर अनारक्षित वर्ग के पात्र उम्मीदवारों से भरने का निर्देश दिया है।
यह मामला वर्ष 2019 का है, जब तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने अध्यादेश और बाद में संशोधन अधिनियम के जरिए ओबीसी वर्ग का आरक्षण 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी करने का फैसला लिया था। इस निर्णय के खिलाफ कई याचिकाएँ दायर की गईं, जिससे करीब सात वर्षों तक यह कानूनी विवाद खिंचता रहा। हाई कोर्ट के फैसले के बाद प्रदेश की राजनीति भी गरमा गई है; जहाँ सत्तापक्ष ने उच्चतम न्यायालय में मजबूती से पक्ष रखने की बात कही है, वहीं विपक्षी दल कांग्रेस ने भी अदालत में चुनौती देने की घोषणा करते हुए विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की मांग की है।
इस फैसले और कानूनी विवाद का सीधा असर राज्य के लाखों अभ्यर्थियों, विद्यार्थियों और युवाओं पर पड़ रहा है। मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) और कर्मचारी चयन बोर्ड द्वारा आयोजित की जाने वाली विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में रुके हुए परिणामों और 13 प्रतिशत होल्ड पदों को लेकर बनी असमंजस की स्थिति अब सुप्रीम कोर्ट में होने वाली आगामी सुनवाई पर निर्भर करेगी।
