** गोवा में लुप्तप्राय समुद्री कछुओं के संरक्षण के लिए व्यापक अभियान; ट्रॉलरों पर टेड अनिवार्य और तटों पर गश्त बढ़ेगी
** गोवा में लुप्तप्राय समुद्री कछुओं के संरक्षण के लिए व्यापक अभियान; ट्रॉलरों पर टेड अनिवार्य और तटों पर गश्त बढ़ेगी
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गोवा में व्यावसायिक मछली पकड़ने वाले गियर और परित्यक्त जालों (घोस्ट नेट्स) से लुप्तप्राय समुद्री कछुओं (सी टर्टल) की सुरक्षा के लिए राज्य स्तर पर एक व्यापक संरक्षण अभियान शुरू करने का फैसला लिया गया है। उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित राज्य समन्वय समिति (SCC) की पहली बैठक में यह कार्ययोजना तय की गई। इस बैठक की अध्यक्षता गोवा के मुख्य वन्यजीव वार्डन और अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (APCCF) के. रमेश कुमार ने की।
इस योजना के अंतर्गत समुद्र तटों, मुहानों और नौकाओं से लावारिस पड़े मछली पकड़ने के जालों को एकत्रित किया जाएगा। ये जाल अक्सर समुद्री जीवों के फंसने और उनकी मौत का कारण बनते हैं। एकत्रित किए गए जालों को गोवा अपशिष्ट प्रबंधन निगम और अधिकृत रीसाइक्लर्स के माध्यम से रीसाइक्लिंग के लिए भेजा जाएगा। इस पहल को सुगम बनाने के लिए राज्य मत्स्य विभाग गोवा की सभी सात प्रमुख मत्स्य जेटियों पर विशेष संग्रह डिब्बे स्थापित करेगा।
इसके साथ ही, मछली पकड़ने वाले सभी ट्रॉलरों पर टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइसेज (TEDs) का शत-प्रतिशत उपयोग अनिवार्य कर दिया गया है। इसके तहत ट्रॉलरों के जालों में कम से कम 35 सेमी गुणा 12 सेमी का एस्केप ओपनिंग (निकासी द्वार) होना अनिवार्य होगा, जिससे जाल में फंसे कछुए सुरक्षित रूप से बाहर निकल सकें और दम घुटने से उनकी जान न जाए। इसके अलावा, घोंसलों की निगरानी, हैचरी संचालन, कछुओं की टैगिंग और सामुदायिक जागरूकता के लिए अगले 10 वर्षों के लिए दो गैर-सरकारी संगठनों (रीफवॉच मरीन कंजर्वेशन और ट्री: ट्रस्ट फॉर रिसर्च, एजुकेशन एंड एनवायरनमेंट) को जिम्मेदारी सौंपी गई है।
तटीय सुरक्षा के तहत, तटीय पुलिस अक्टूबर से मई तक दिन में नियमित गश्त करेगी। इसके साथ ही, प्रमुख नेस्टिंग बीचों—मोरजिम, मांद्रेम, अगोंडा और गलगिबाग—पर रात 8 बजे से सुबह 6 बजे तक विशेष रात्रि गश्त की जाएगी। कछुओं के घोंसले, अंडों की चोरी या घायल कछुओं की सूचना देने के लिए एक सिंगल-पॉइंट हेल्पलाइन भी शुरू की जा रही है। इस कदम का सीधा असर स्थानीय मछुआरों और तटीय पर्यटन पर पड़ेगा, जहां मछुआरों को नियमों का कड़ाई से पालन करना होगा और तटीय पर्यावरण के प्रति जन-जागरूकता को बढ़ावा मिलेगा।
