लाहौल-स्पीति की घेपन घाट हिमनद झील पर स्थापित हुआ देश का पहला GLOF अर्ली वार्निंग सिस्टम
लाहौल-स्पीति की घेपन घाट हिमनद झील पर स्थापित हुआ देश का पहला GLOF अर्ली वार्निंग सिस्टम
हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिले लाहौल-स्पीति में स्थित घेपन घाट हिमनद (ग्लेशियर) झील पर देश की पहली 'ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड' (GLOF) प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (अर्ली वार्निंग सिस्टम) सफलतापूर्वक स्थापित कर दी गई है। समुद्र तल से लगभग 4,100 मीटर की अत्यधिक ऊंचाई और विषम भौगोलिक परिस्थितियों में स्थापित यह आधुनिक प्रणाली हिमनद झीलों के फटने से उत्पन्न होने वाले संभावित बाढ़ के खतरों की निगरानी करेगी। यह पहल उच्च हिमालयी क्षेत्रों में आपदा जोखिम को कम करने और पारंपरिक आपदा प्रतिक्रिया के स्थान पर विज्ञान-आधारित पूर्व निगरानी तंत्र को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम है।
इस चेतावनी प्रणाली को सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (C-DAC) द्वारा विकसित किया गया है और इसे राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा वित्तपोषित पायलट परियोजना के अंतर्गत क्रियान्वित किया गया है। इस अत्याधुनिक प्रणाली में लगे सेंसर झील के जलस्तर, प्रवाह और आसपास के पर्यावरणीय बदलावों का वास्तविक समय (रियल-टाइम) डेटा जुटाएंगे। किसी भी असामान्य जल वृद्धि या झील के प्राकृतिक तटबंध टूटने की आशंका होने पर यह तंत्र समय रहते आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और स्थानीय प्रशासन को सतर्क कर देगा।
वैज्ञानिक अध्ययनों और उपग्रह निगरानी के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण घेपन घाट झील का क्षेत्रफल वर्ष 1989 में लगभग 36.49 हेक्टेयर से बढ़कर वर्ष 2022 तक 101 हेक्टेयर से अधिक हो गया था। झील के आकार में 170 प्रतिशत से अधिक की इस वृद्धि के चलते निचले रिहायशी क्षेत्रों के लिए गंभीर जोखिम उत्पन्न हो गया था। झील से लगभग 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सिस्सू गांव सहित चंद्रा नदी घाटी के निचले इलाके, मनाली-लेह राजमार्ग का हिस्सा और आसपास की बस्तियां संभावित जलप्रलय के अत्यधिक खतरे के दायरे में चिह्नित की गई हैं।
इस चेतावनी प्रणाली के सक्रिय होने से घाटी में रहने वाले स्थानीय निवासियों, पर्यटकों और नदी तटीय बुनियादी ढांचे की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी। प्रारंभिक चेतावनी मिलने से आपातकालीन परिस्थितियों में स्थानीय प्रशासन को राहत व बचाव दलों को सक्रिय करने और आबादी को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित करने के लिए पर्याप्त समय मिल सकेगा। इस परियोजना के अनुभवों के आधार पर राज्य की अन्य संवेदनशील हिमनद झीलों पर भी भविष्य में इसी तरह के निगरानी तंत्र स्थापित करने की योजना है।
