बिहार के स्वास्थ्य केंद्रों में मृत शिशु जन्म (स्टिलबर्थ) की डिजिटल ट्रैकिंग की तैयारी, कारणों का रखा जाएगा विस्तृत ब्योरा

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बिहार के स्वास्थ्य केंद्रों में मृत शिशु जन्म (स्टिलबर्थ) की डिजिटल ट्रैकिंग की तैयारी, कारणों का रखा जाएगा विस्तृत ब्योरा - AI Featured Image

बिहार के स्वास्थ्य केंद्रों में मृत शिशु जन्म (स्टिलबर्थ) की डिजिटल ट्रैकिंग की तैयारी, कारणों का रखा जाएगा विस्तृत ब्योरा

**डिजिटल निगरानी प्रणाली की शुरुआत**

बिहार सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं में मृत शिशु जन्म (स्टिलबर्थ) की सटीक निगरानी और रोकथाम के लिए केंद्र सरकार के नए दिशा-निर्देशों को लागू करने की तैयारी कर रही है। इसके तहत राज्य के सभी स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों में पोर्टल-आधारित रिपोर्टिंग प्रणाली शुरू की जाएगी। नई व्यवस्था के तहत किसी भी अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र में मृत जन्म का मामला सामने आने पर 24 घंटे के भीतर पोर्टल पर उसकी प्रारंभिक रिपोर्ट दर्ज करनी होगी और सात दिनों के भीतर मामले का पूर्ण दस्तावेजीकरण करते हुए मृत्यु के कारणों का विस्तृत ब्योरा दर्ज करना अनिवार्य होगा।

**स्टिलबर्थ के मानक और रिपोर्टिंग प्रक्रिया**

केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुसार, गर्भावस्था के 28 सप्ताह या उससे अधिक समय के बाद बिना जीवन के लक्षणों के पैदा होने वाले बच्चे को 'स्टिलबर्थ' माना जाता है। जिन मामलों में गर्भकाल की सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं होगी, वहां जन्म के समय 1,000 ग्राम या उससे अधिक वजन अथवा 35 सेंटीमीटर या उससे अधिक लंबाई को मानक माना जाएगा। अब तक अस्पतालों में यह प्रक्रिया केवल रजिस्टरों में संख्या दर्ज करने तक सीमित थी, लेकिन अब ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से प्रत्येक मामले के पीछे के चिकित्सीय कारणों, जटिलताओं और कमियों का विश्लेषण किया जाएगा।

**आधिकारिक आँकड़े और मौजूदा स्थिति**

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में होने वाले कुल मृत जन्म मामलों में से लगभग 30 प्रतिशत हिस्सेदारी अकेले बिहार और उत्तर प्रदेश की है। बिहार में विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी स्तरों पर स्टिलबर्थ के आंकड़ों में अंतर देखा गया है:

– सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) के अनुसार, राज्य में यह दर वर्ष 2022 में 3 प्रति 1,000 जन्म, वर्ष 2023 में 4 प्रति 1,000 जन्म और वर्ष 2024 में 2 प्रति 1,000 जन्म दर्ज की गई थी।

– हेल्थ मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम (एचएमआईएस) के अनुसार यह दर प्रति 1,000 जन्म पर 9 दर्ज है।

– तीसरे पक्ष के स्वतंत्र अध्ययनों में यह दर लगभग 11 प्रति 1,000 जन्म आंकी गई है, जो राष्ट्रीय अनुमान के करीब है।

– बिहार सरकार के सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (सीआरएस) स्टिलबर्थ डैशबोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 से 2026 के बीच राज्य में आधिकारिक रूप से 94,759 स्टिलबर्थ दर्ज किए गए, जिनमें 52,000 से अधिक बालक और 42,000 से अधिक बालिकाएं शामिल हैं। वर्ष 2025 में बेहतर रिपोर्टिंग के चलते यह संख्या 63,850 दर्ज हुई थी, जबकि वर्ष 2026 में अब तक 1,659 मामले दर्ज किए गए हैं।

**प्रशिक्षण और प्रशासनिक तैयारी**

इस प्रणाली को जमीनी स्तर पर प्रभावी बनाने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, बिहार स्वास्थ्य विभाग और यूनिसेफ के संयुक्त तत्वावधान में पटना में एक दो दिवसीय क्षेत्रीय कार्यशाला आयोजित की गई। इस कार्यशाला में लगभग 60 चिकित्सा विशेषज्ञों, मेडिकल कॉलेजों के शिक्षकों, कार्यक्रम प्रबंधकों और सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों ने भाग लिया। इसका मुख्य उद्देश्य मृत शिशु जन्म की पहचान, वर्गीकरण, समीक्षा और प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर सुधारात्मक कदम उठाना है।

**आम जनता पर प्रभाव और आगे की रूपरेखा**

भारत के नवजात कार्य योजना (आईएनएपी) और सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के तहत 2030 तक स्टिलबर्थ दर को एकल अंक (सिंगल डिजिट) में लाने का लक्ष्य तय किया गया है। डिजिटल निगरानी शुरू होने से स्वास्थ्य तंत्र को यह समझने में मदद मिलेगी कि प्रसव पूर्व जांच (एएनसी), समय पर रेफरल प्रणाली या प्रसव कक्ष की देखभाल में क्या कमियां रह जाती हैं। इससे उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं की समय रहते पहचान कर उचित उपचार सुनिश्चित किया जा सकेगा, जिससे भविष्य में शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकेगी।

**नागरिकों और परिवारों के लिए उपयोगी जानकारी**

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, प्रसव पूर्व समय पर नियमित जांच कराना, गर्भावस्था के दौरान रक्तचाप व मधुमेह की निरंतर निगरानी रखना और जटिलता महसूस होते ही बिना देरी किए प्राथमिक या उच्च स्वास्थ्य केंद्रों पर संपर्क करना स्टिलबर्थ के जोखिम को काफी हद तक कम कर सकता है। सरकारी अस्पतालों में डिजिटल पंजीकरण और निगरानी से उच्च जोखिम वाले मामलों में तुरंत एम्बुलेंस व रेफरल सहायता मिलना आसान होगा।

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