हिमाचल हाईकोर्ट ने मातृत्व लाभ मांगने वाली गर्भवती महिला वैज्ञानिक की बर्खास्तगी पर लगाई रोक, सेवा में बने रहने का दिया निर्देश

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हिमाचल हाईकोर्ट ने मातृत्व लाभ मांगने वाली गर्भवती महिला वैज्ञानिक की बर्खास्तगी पर लगाई रोक, सेवा में बने रहने का दिया निर्देश - AI Featured Image

हिमाचल हाईकोर्ट ने मातृत्व लाभ मांगने वाली गर्भवती महिला वैज्ञानिक की बर्खास्तगी पर लगाई रोक, सेवा में बने रहने का दिया निर्देश

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने मातृत्व लाभ (मैटरनिटी बेनिफिट्स) के लिए आवेदन करने के महज तीन दिन बाद नौकरी से हटाई गई एक गर्भवती महिला वैज्ञानिक की बर्खास्तगी के आदेश पर रोक लगा दी है। उच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति ज्योत्सना रीवाल दुआ की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता को अंतरिम राहत देते हुए संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि मामले की अगली सुनवाई तक उन्हें सेवा में निरंतर बने रहने दिया जाए।

मामले के तथ्यों के अनुसार, डॉ. आइना शर्मा को केंद्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग द्वारा वित्तपोषित 'वायरल रिसर्च एंड डायग्नोस्टिक लेबोरेटरी' (वीआरडीएल) परियोजना के तहत अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), बिलासपुर के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में 'वैज्ञानिक-बी' (मेडिकल) के पद पर नियुक्त किया गया था। यह नियुक्ति आरंभ में एक वर्ष के लिए हुई थी, जिसे बाद में 31 मार्च 2027 तक के लिए विस्तारित कर दिया गया था। याचिकाकर्ता ने अपनी गर्भावस्था के चलते 4 अगस्त 2026 को मातृत्व लाभ के लिए विभाग के समक्ष आवेदन किया, किंतु इसके ठीक तीन दिन बाद 7 अगस्त 2026 को विभाग ने उनकी सेवाएं समाप्त करने का आदेश जारी कर दिया।

प्रशासन ने सेवा समाप्ति के पीछे 16वें वित्त आयोग की अवधि के दौरान संशोधित वीआरडीएल योजना के तहत नए स्टाफिंग पैटर्न को लागू करने का हवाला दिया था। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और तर्क दिया कि उनका अनुबंध पहले ही मार्च 2027 तक बढ़ाया जा चुका था तथा योजना समाप्त नहीं हुई थी। ऐसे में मातृत्व अवकाश का आवेदन करते ही सेवा समाप्त करना उनके अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है।

अदालत ने बर्खास्तगी आदेश पर रोक लगाते हुए केंद्र सरकार (स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव के माध्यम से), स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) तथा एम्स बिलासपुर को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 18 नवंबर को निर्धारित की है। यह न्यायिक हस्तक्षेप अनुबंध व परियोजना आधारित पदों पर कार्यरत महिला कर्मचारियों के मातृत्व अधिकारों और कार्यस्थल पर उनकी सामाजिक सुरक्षा के संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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