कर्नाटक उच्च न्यायालय ने अवैध अप्रवासियों से निपटने के लिए जिला स्तरीय समितियां गठित करने का दिया निर्देश, सतर्क नागरिक पर दर्ज केस रद्द
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने अवैध अप्रवासियों से निपटने के लिए जिला स्तरीय समितियां गठित करने का दिया निर्देश, सतर्क नागरिक पर दर्ज केस रद्द
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह पूरे राज्य में अवैध अप्रवासन (अवैध प्रवासियों) के मामलों से निपटने और उनकी पहचान व निगरानी सुनिश्चित करने के लिए तीन महीने के भीतर जिला स्तरीय समितियां गठित करे। न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026 को बेंगलुरु निवासी डॉक्टर और सामाजिक कार्यकर्ता नागेंद्रप्पा टी. द्वारा दायर याचिका का निपटारा करते हुए यह ऐतिहासिक आदेश जारी किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि आदेश की प्रति मिलने के तीन महीने के भीतर इन समितियों का गठन कर अनुपालन रिपोर्ट उच्च न्यायालय की रजिस्ट्री में प्रस्तुत की जाए।
इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता नागेंद्रप्पा के खिलाफ बेंगलुरु के बेलंदूर और वर्थूर पुलिस थानों में दर्ज दो अलग-अलग प्राथमिकियों (FIR) को भी पूरी तरह से रद्द कर दिया। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग कर सतर्क नागरिकों को प्रताड़ित नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा और वैध नियमों से जुड़ा मामला प्रशासन के संज्ञान में लाया हो।
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, जुलाई 2026 में याचिकाकर्ता ने बेलंदूर पुलिस को सूचित किया था कि कुछ संदिग्ध विदेशी नागरिक बिना वैध पासपोर्ट या वीजा के बेंगलुरु के हदोसिद्दापुरा क्षेत्र में अवैध रूप से रह रहे हैं। पुलिस ने शुरुआती जांच के बाद संबंधित व्यक्तियों को विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (FRRO) के समक्ष पेश करने की प्रक्रिया शुरू की। हालांकि, कुछ ही समय बाद जवाबी कार्रवाई के तहत याचिकाकर्ता पर मारपीट और अन्य आरोपों में क्रास-शिकायत दर्ज कराई गई, जिसके आधार पर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। बाद में उन्होंने उच्च न्यायालय का रुख कर इन प्राथमिकियों को रद्द करने और राहत की मांग की थी।
अदालत के इस फैसले का सीधा असर राज्य की कानून-व्यवस्था और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर पड़ेगा। जिला स्तर पर उच्चाधिकार प्राप्त समितियों के गठन से अवैध अप्रवासियों की पहचान और सत्यापन की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी, संस्थागत और जवाबदेह होगी, जिससे स्थानीय नागरिकों और कानून का पालन कराने वाली एजेंसियों के बीच समन्वय बेहतर होने की संभावना है। साथ ही, किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना पुलिस को देने वाले आम नागरिकों को बदले की भावना से दर्ज होने वाले झूठे मुकदमों से कानूनी संरक्षण का भरोसा मिलेगा।
