सोशल मीडिया पोस्ट पर अंधाधुंध एफआईआर और गिरफ्तारी पर कर्नाटक उच्च न्यायालय ने लगाई लगाम, पुलिस के लिए जारी किए दिशानिर्देश
सोशल मीडिया पोस्ट पर अंधाधुंध एफआईआर और गिरफ्तारी पर कर्नाटक उच्च न्यायालय ने लगाई लगाम, पुलिस के लिए जारी किए दिशानिर्देश
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने सोशल मीडिया पोस्ट और टिप्पणियों के आधार पर पुलिस द्वारा मनमाने ढंग से प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज करने और अनावश्यक गिरफ्तारियों पर रोक लगाने के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि ऑनलाइन अभिव्यक्ति या आलोचना पर शिकायत मिलते ही यांत्रिक तरीके से आपराधिक मामले दर्ज नहीं किए जाने चाहिए। अदालत ने राज्य के पुलिस महानिदेशक और महानिरीक्षक को निर्देश दिया कि इन सिद्धांतों और दिशा-निर्देशों को सभी क्षेत्राधिकार पुलिस अधिकारियों तक प्रशासनिक निर्देशों के रूप में पहुँचाया जाए और इनका कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए।
यह कानूनी व्यवस्था दक्षिण कन्नड़ जिले के पुत्तूर से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान दी गई। अदालत ने 'कर्नाटक पोर्टफोलियो' नामक सोशल मीडिया खाते के संचालक संदीप कुमार के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 353(2) के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया। याचिकाकर्ता ने एक महिला का पीछा करने और धमकाने से संबंधित खबर को साझा किया था। इस एक ही पोस्ट और घटना को लेकर पुत्तूर नगर पुलिस थाने में अलग-अलग शिकायतकर्ताओं के आधार पर सात अलग-अलग मामले दर्ज कर लिए गए थे। अदालत ने इस बहुलता पर सख्त ऐतराज जताया।
उच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित नियमों के तहत, सोशल मीडिया संबंधी किसी भी शिकायत पर सबसे पहले पुलिस को यह जांचना होगा कि प्रथम दृष्टया कथित अपराध के वास्तविक तत्व मौजूद हैं या नहीं। केवल कानूनी धाराओं की भाषा दोहरा देने से मामला दर्ज नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही, एक ही घटना पर केवल शिकायतकर्ता अलग होने की वजह से नई एफआईआर दर्ज करने पर रोक लगाई गई है, जब तक कि वह कोई स्वतंत्र और विधिक रूप से भिन्न अपराध न हो। उपयुक्त मामलों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173(3) के तहत प्रारंभिक जांच करने पर जोर दिया गया है।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि एफआईआर दर्ज होने का अर्थ स्वतः गिरफ्तारी नहीं होता। पीठ ने टिप्पणी की कि शब्दों और अभिव्यक्ति के प्रभाव को एक संतुलित, समझदार और साहसी व्यक्ति के नजरिए से आंका जाना चाहिए, न कि ऐसे व्यक्ति के रूप में जो हर आलोचना को अपने लिए खतरा मान लेता है। इस फैसले से राज्यभर में इंटरनेट और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुरक्षा मिलने और तुच्छ शिकायतों पर पुलिस की मनमानी कार्रवाई पर रोक लगने की उम्मीद है।
