बिहार के स्वास्थ्य केंद्रों में स्टिलबर्थ की ऑनलाइन ट्रैकिंग की तैयारी, पोर्टल पर दर्ज होगा मृत जन्म के कारणों का ब्योरा
बिहार के स्वास्थ्य केंद्रों में स्टिलबर्थ की ऑनलाइन ट्रैकिंग की तैयारी, पोर्टल पर दर्ज होगा मृत जन्म के कारणों का ब्योरा
बिहार सरकार अपने सभी स्वास्थ्य केंद्रों में नवजातों के मृत जन्म (स्टिलबर्थ) की निगरानी और कारणों की सटीक पहचान के लिए केंद्र सरकार के नए दिशा-निर्देशों को लागू करने की तैयारी में है। राज्य में अब स्वास्थ्य सुविधाओं के स्तर पर होने वाले प्रत्येक स्टिलबर्थ की ऑनलाइन ट्रैकिंग की जाएगी, जिससे यह स्पष्ट रूप से दर्ज किया जा सके कि गर्भ में या प्रसव के दौरान शिशु की मृत्यु किन चिकित्सीय अथवा प्रणालीगत कारणों से हुई।
नई डिजिटल निगरानी प्रणाली और रिपोर्टिंग की प्रक्रिया
नई व्यवस्था के तहत स्टिलबर्थ से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग 'मैटरनल, पेरिनेटल, चाइल्ड डेथ सर्विलांस एंड रिस्पांस' (MPCDSR) पोर्टल पर अनिवार्य रूप से की जाएगी। इसके लिए निर्धारित समय-सीमा और जिम्मेदारियां तय की गई हैं:
– स्वास्थ्य सुविधा के नोडल अधिकारी को किसी भी स्टिलबर्थ की घटना की सूचना 24 घंटे के भीतर पोर्टल पर देनी होगी।
– जिस डॉक्टर, नर्स या एएनएम (ऑक्सिलरी नर्स मिडवाइफ) की देखरेख में प्रसव हुआ है, उन्हें 7 दिनों के भीतर या प्रसूता के अस्पताल से डिस्चार्ज होने से पहले निर्धारित रिपोर्टिंग फॉर्म भरना होगा।
– इसके बाद डेटा एंट्री ऑपरेटर इन जानकारियों और विवरणों को पोर्टल पर डिजिटल रूप से अपलोड करेंगे।
स्टिलबर्थ का पैमाना और कारणों का वर्गीकरण
जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, 28 सप्ताह या उससे अधिक के गर्भकाल के बाद बिना किसी जीवन लक्षण के जन्म लेने वाले बच्चे को स्टिलबर्थ माना जाएगा। यदि गर्भकाल की अवधि का सही विवरण उपलब्ध न हो, तो 1,000 ग्राम या उससे अधिक वजन अथवा 35 सेंटीमीटर या उससे अधिक लंबाई वाले मृत जन्मे शिशु को इस श्रेणी में शामिल किया जाएगा।
पोर्टल पर प्रत्येक मामले का संक्षिप्त इतिहास और समीक्षा दर्ज की जाएगी। इसके तहत कारणों को तीन प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाएगा:
1. प्रसवपूर्व (Antenatal): गर्भावस्था के दौरान उत्पन्न होने वाली जटिलताओं के कारण हुई मृत्यु।
2. मातृ स्वास्थ्य संबंधी (Maternal): मां की स्वास्थ्य स्थिति अथवा बीमारी से जुड़े कारण।
3. प्रसवकालीन (Intrapartum): प्रसव पीड़ा और प्रसव प्रक्रिया के दौरान होने वाली जटिलताएं।
आधिकारिक बयान और निगरानी तंत्र
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, स्टिलबर्थ के पीछे के गहरे कारणों की पहचान कर उनके समाधान के लिए मानक प्रोटोकॉल निर्धारित किए गए हैं। राज्य के स्वास्थ्य सचिव कुमार रवि के अनुसार, स्वास्थ्य विभाग भारत सरकार द्वारा विशेषज्ञ साझेदारों के सहयोग से जारी दिशा-निर्देशों और प्रोटोकॉल का पालन करने के लिए तैयार है, और इसे पूरे राज्य की स्वास्थ्य सुविधाओं में पोर्टल-आधारित प्रणाली के माध्यम से लागू किया जा रहा है। इस संबंध में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा यूनिसेफ के सहयोग से दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला भी आयोजित की जा चुकी है।
निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए स्वास्थ्य केंद्रों के स्तर पर हर महीने मामलों की समीक्षा की जाएगी। जिला स्तर पर मासिक बैठकों में इन मामलों का विश्लेषण होगा, जबकि राज्य स्तर पर चुनिंदा मामलों की त्रैमासिक समीक्षा की जाएगी। विशिष्ट व बड़े अस्पताल विस्तृत डेटा दर्ज करेंगे, जबकि प्राथमिक स्तर के केंद्र मुख्य संकेतकों की रिपोर्ट देंगे।
पृष्ठभूमि और सांख्यिकीय आंकड़े
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अब तक अस्पतालों में स्टिलबर्थ की रिपोर्टिंग मुख्य रूप से रजिस्टर में केवल संख्या दर्ज करने तक ही सीमित थी और कारणों की गहन पड़ताल के लिए कोई मजबूत तंत्र नहीं था। विशेषज्ञों का आकलन है कि भारत में होने वाले कुल स्टिलबर्थ में बिहार और उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी लगभग 30 प्रतिशत है।
आधिकारिक सैम्पल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) के 2022 से 2024 के आंकड़ों में बिहार की स्टिलबर्थ दर प्रति 1,000 जन्मों पर 2 से 4 के बीच दर्ज की गई है। एसआरएस 2022 में यह दर 3 (राष्ट्रीय औसत 5), 2023 में 4 (राष्ट्रीय औसत 7) और 2024 में 2 (राष्ट्रीय औसत 7) दर्ज की गई थी। वहीं, हेल्थ मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम (HMIS) के अनुसार यह दर प्रति 1,000 जन्म पर लगभग 9 है, जबकि विभिन्न स्वतंत्र एजेंसियों का अनुमान इसे 11 के करीब बताता है, जो संयुक्त राष्ट्र के 2023 के राष्ट्रीय अनुमान (11.8) के निकट है। सतत विकास लक्ष्यों (SDG) के तहत 2030 तक इस दर को राष्ट्रीय स्तर पर इकाई अंक (सिंगल डिजिट) में सीमित करने का लक्ष्य रखा गया है।
आम नागरिकों और स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रभाव
कागजी रजिस्टरों से हटकर डिजिटल और कारण-आधारित निगरानी लागू होने से स्वास्थ्य विभाग को यह समझने में मदद मिलेगी कि किन क्षेत्रों में प्रसवपूर्व जांच (एएनसी), समय पर रेफरल या प्रसव के दौरान आपातकालीन देखभाल में कमियां रह रही हैं। इससे सरकारी अस्पतालों में मातृत्व और नवजात स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार होगा, रोकी जा सकने वाली मौतों के कारणों का समय पर निवारण किया जा सकेगा और ग्रामीण व दूरदराज के क्षेत्रों में गर्भवती महिलाओं को बेहतर व सुरक्षित प्रसव सुविधाएं मिल सकेंगी।
